Wednesday, 27 June 2012

महरूमियों में कैफ सा पाने लगा हूं मैं? ----------------------------



ये पिछले महीने भर से बाहर गयी है। औरंगाबाद में बुजुर्ग फूफाजी का निधन हो गया। भैया के साथ चली गयी। शादी के बाद बारह साल में पहली बार अपने रिश्तेदारों से उनके घर में मिलना हुआ। नासिक और पुणे में भी बहुत से संबंधी रहते हैं। यह वहीं रुक गयी। नासिक होते हुए अभी पुणे में है। अभी कुछ दिन और रहने का प्रोग्राम है। बीच में सहेली के पास मुंंबई जाने का भी प्लान था। पता नहीं जाएगी कि नहीं। आज सासूजी से बात हुई। उनका कहना है कि बारिश में लौटना मुश्किल हो जाएगा। अभी पानी रुका है इसलिए मैंने अभी लौट आने की सलाह दी है। अपने एक फुफेरे भाई के यहां कुछ दिन रहकर शायद लौट आए।

इसके जाने से आजादी तो मिली है लेकिन पता है कि यह चांदनी चार दिनों की है। ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है। इस बीच काफी सारा काम कर सकता था। लेकिन हम तो ऐसे हैं भइया।

ज्यादातर समय खाना बनाने, खाने, टीवी देखने और सोने में गुजर रहा है। काम बोले तो एक भी नहीं हुआ। टेबल सुधरवा सकता था। कूलर साफ कर सकता था। सेजबहार में अपने घर को ठीक ठाक कर सकता था। मैगजीन निकालने की पहल कर सकता था।

पता नहीं अब कुछ करने की शायद हिम्मत नहीं हो रही। लगता है अब हाथ पांव मारने का कोई मतलब नहीं है।

चुपचाप नौकरी करते करते मर जाओ, जैसा कि ज्यादातर शुभचिंतक सलाह देते हैं।

लेकिन यह भी लग रहा है कि अब जो करूंगा, अधिक ठोस रूप में करूंगा। दफ्तर और घर की  लादी हुई जिम्मेदारियों को ढोते हुए अपना काम करूंगा तो अधिक स्थायी रहेगा। क्योंकि दफ्तर न सही, घर की जिम्मेदारियां तो कहीं जाने वाली नहीं हैं।

Saturday, 16 June 2012

फादर्स डे


16 जून, 2012
कल फादर्स डे है।
आज दफ्तर में एक प्रेजेंटेशन दिखाया गया। इसमें एक बाप बेटे की कहानी थी। दोनों घर के  बगीचे में बैठे थे। बुजुर्ग पिता ने पूछा-वो क्या है? अखबार पढ़ रहे जवान बेटे ने देखा और बताया- वो एक चिडिय़ा है। थोड़ी देर बाद पिता ने फिर पूछा- वो क्या है। बेटे ने कहा- बताया तो कि वो एक चिडिय़ा है। तीसरी बार पिता ने फिर पूछा तो बेटा नाराज हो गया। उसने पिता को डांटा कि वे बार बार यही सवाल क्यों कर रहे हैं। पिता उठकर भीतर गए और एक पुरानी डायरी उठा लाए। कोई पन्ना खोलकर उसे बेटे को पढऩे दिया। बेटे ने पढ़ा, उसमें लिखा था- आज मेरा बेटा तीन साल का हो गया। आज उसने एक चिडिय़ा को देखकर मुझसे पूछा- वो क्या है। मैंने उसे बताया कि वह एक चिडिय़ा है। उसने यही सवाल मुझसे 21 बार पूछा। हर बार मैंने उसे बताया कि वह एक चिडिय़ा है। बगैर नाराज हुए, क्योंकि मैं उससे प्यार करता हूं।
बेटे की आंखें खुल गयीं। उसने पिता को गले लगा लिया।
कहानी मर्मस्पर्शी थी। संपादक ने संकल्प दिलाया कि सब घर जाकर माता पिता का आशीर्वाद लेंगे और उन्हें प्यार से गले लगाएंगे।  फादर्स डे के पहले की यह शाम सार्थक हो गयी।
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पापाजी को मैं अक्सर याद करता रहता हूं। लंबे समय तक हम लोग उनके प्रभाव में रहे। उनकी ही बनाई गुडविल की छत्रछाया में जीते रहे। पापाजी के जीवन में पैसे की कमी हमेशा रही। लेकिन हम लोगों को उसका अहसास बहुत कम हुआ। हम लोगों को जो चीजें हासिल थीं वे पैसे से नहीं खरीदी जा सकती थीं।
कवि होने के कारण वे लगातार एक कल्पना की दुनिया में रहते थे। मगर घर की जिम्मेदारियां भी वे भूलते नहीं थे।
उनसे जुड़ी मेरी सबसे पुरानी याद यह है कि वे कॉलेज के किसी कार्यक्रम के बाद मुझे गोद में लेकर, एक हाथ से साइकिल थामे लौट रहे थे। मैं उनके कंधों पर सिर रखकर ऊंघ रहा था।
मुझे वे शाम को अपने साथ घुमाने ले जाते थे। पुराने बस स्टैंड का वो माहौल मेरे बचपन की यादों का एक जरूरी हिस्सा है। वहां एक होटल थी जिसका नाम कॉफी हाउस था। वहां पहली बार मैंने दोसा खाया। उसका स्वाद इतना पसंद आया कि बता नहीं सकता। पापाजी की मित्र मंडली को भी शायद पता था कि मुझे यह पसंद है। मेरा खयाल है इतना पसंद होने के बाद भी मैं पूछने पर पहले ना नुकुर करता था। यह आदत बहुत दिनों तक रही। शायद तब तक, जब तक पापाजी रहे।
बचपन में एक बार मेरे पांव में कोई जख्म पक गया था और उसमें टीस उठ रही थी। पापाजी ने उसे साफ कर ड्रेसिंग कर दी थी। मेरी आंख के इलाज के लिए वे लंबे समय तक मुझे बस से रायपुर ले जाते रहे। कुछ दिन मैं डीके अस्पताल में दाखिल रहा। फिर बूढ़ापारा में डा. जनस्वामी के नर्सिंग होम में मेरी आंख के दो ऑपरेशन हुए। वहां सुबह पापाजी मेरे लिए चौक से नाश्ता लेकर आते थे।ं उनके मित्र बसंत दीवान को पता चला तो वे दोपहर को खाना लेकर आने लगे। ममेरी बुआ भी शायद खाना लेकर पहुंची थीं। डाक्टर साहब भी पापाजी के परिचित थे। मैं वहां कितनी सुरक्षा और कितनी सुविधा के बीच रहा।
पीईटी दिलाने के लिए मैं पापाजी के साथ कुछ रोज रायपुर के गॉस मेमोरियल सेंटर में ठहरा। यहीं मैंने पहली बार बटर स्लाइस नाम की चीज खाई और शायद पहली बार मक्खन का स्वाद जाना।
पॉलीटेक्निक में एडमिशन के लिए भी शायद पापाजी के साथ ही गया था।
मैं गणित नहीं पढऩा चाहता था। पापाजी के दबाव में मुझे यह विषय लेना पड़ा। पॉलिटेक्निक की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाया। इसके बाद मेरा एडमिशन बीएससी गणित में करवा दिया गया। वहां भी कुछ रोज जाकर मैंने क्लास अटेंड करना बंद कर दिया। अपनी असफलताओं के चलते पापाजी समेत मेरी घर के ज्यादातर सदस्यों से बात बंद हो गयी। कुछ रोज मैं आम बेरोजगारों की तरह भटकता रहा। फिर एक स्थानीय प्रेस में काम करना शुरू किया। पापाजी अपने मित्रों से मुझे समझाने को कहते थे। यह उनके मित्रों की बातों से पता चलता था। लेकिन मैं किसी गलत राह पर जा नहीं रहा था। इसलिए किसी की बात सुनने को तैयार नहीं था। कुछ अरसा इसी तरह गुजरा। परिचितों के बीच आम धारणा थी कि मुझे लेकर पापाजी बहुत परेशान हैं।
बाद के दिनों में, जब मैं रायपुर में काम करने लगा और शायद मेरे काम की तारीफ भी घर तक पहुंचने लगी तो पापाजी को अच्छा लगने लगा। फिर मैं रायपुर में उनका एक संपर्क सूत्र बन गया। लगभग हर साप्ताहिक छुट्टी में मैं अखबार के बंडल पहुंचाने वाली गाड़ी से घर जाता था। वे अपने मित्रों का हालचाल पूछते थे। हालांकि उनमें से शायद ही किसी से मेरी मुलाकात होती थी। मेरा काम डेस्क का था। और वैसे भी एक मशहूर बाप के नालायक बच्चे के रूप में किसी से मिलने में मेरी दिलचस्पी नहीं थी। फिर भी कुछ न कुछ ऐसा मेरे पास होता था जिसे सुनकर उन्हें आनंद आता था।
फिर वह समय भी आया जब पापाजी बिस्तर पर पड़ गए। मां, छोटे भाई और घर से दूसरे सदस्यों ने उनकी खूब सेवा की। मैं साप्ताहिक छुट्टी में घर जाता था और  अपना रिकार्ड दुरुस्त करने के लायक उनका मनोरंजन व थोड़ी बहुत सेवा करता था।
एक बार साप्ताहिक छुट्टी में मैं घर नहीं जा पाया। दूसरे दिन रात में दफ्तर में काम के दौरान पापाजी का फोन आया। उन्होंने बहुत याचक भाव से कहा- यार तुम आए नहीं? बहुत बोरियत लगती है। यह सुनकर मेरा दिमाग झनझना गया। जिन पापाजी को हम सिर्फ देने वाले के रूप मेें जानते थे वे कितने असहाय और जरूरतमंद हो गए हैं। मैं उसी रात टैक्सी से धमतरी गया।
शुगर के कारण उन्हें कई बार अस्पताल दाखिल करना पड़ा। एक बार रात में खबर मिलने पर मैं अखबार वाली गाड़ी से धमतरी गया। बस स्टैंड के सामने ही अस्पताल था। मैं सीधे वहीं गया। सुबह के पांच छह बजे होंगे। वे जाग रहे थे। मुझे देखकर बोले-हमारे कारण तुम लोगों को कितनी परेशानी होती है।
मां उनकी बहुत सेवा करती थी। स्कूल की ड्यूटी के साथ साथ उनकी सेवा करना आसान नहीं था। बड़ी बहन ने एक बार बताया कि मां की सेवाओं के लिए वे बहुत कृतज्ञता अनुभव करते हैं। अस्पताल में एक बार उन्होंने कहा था कि तुम्हारी मां के एहसानों का कर्ज मैं सात जनम में नहीं उतार पाऊंगा। मुझसे उन्होंने एक बार कहा था- अपनी मां को कभी दुख मत देना। अपनी मां को भी वे बहुत मानते थे। उनके जाने के समय मैंने पहली बार उनकी आंखों में नमी देखी थी।
दादी के गुजरने के बाद बुआ ने मोर्चा संभाल लिया था। बच्चों के लिए फरमान हो गया था कि मुंडन करवाना पड़ेगा। काका के बड़े बेटे का मुंडन हो चुका था। बुआ छोटे के पीछे पड़ी थी। वह मुंडन नहीं करवाना चाहता था। पापाजी ने उसका साथ दिया। बुआ से कह दिया कि बच्चा नहीं चाहता तो क्यों पीछे पड़ी हो।
रीति रिवाजों का वे सम्मान करते थे लेकिन उन्हें सिर पर चढ़ा लेना या हौवा बना देना उन्हें पसंद नहीं था। सिद्धांतत: वे हर इंसान की आजादी का सम्मान करते थे। उसके विवेक का आदर करते थे।
उनसे विरासत में मुझे भाषा मिली। अपनी रोटी खुद कमाने का जज्बा मिला। बेटों को लेकर उन्होंने कोई बड़े सपने नहीं देखे थे। ग्रैजुएट होकर कहीं क्लर्क बन जाओगे तो जिंदगी कट जाएगी, यह उनकी सोच थी। बेटियों को लेकर वे जरूर संवेदनशील थे। वे उन्हें आत्मनिर्भर देखना चाहते थे। वे गर्मी की छुट्टियों में हमें टाइपिंग सीखने भेज देते थे।
उनके फैसलों को लेकर मेरे मन में बहुत मलाल नहीं है। उन्होंने अपने विवेक से अच्छा ही सोचा होगा।
उनसे मुझे विरासत में फक्कड़पन भी मिला। लेकिन फक्कड़पन के साथ सिर उठाकर जीने के लिए जरूरी है कि आप इंसान को पैसे से तोलने वालों के सामने मजबूती से खड़े रह सकें। वह मजबूती मैं पा नहीं सका।

Thursday, 14 June 2012

अच्छे काम की कदर तो है



आज एक प्रतिभाशाली बच्ची की स्टोरी आयी. मैंने कुछ हेडिंग्स बनायीं। उन्हें अपने पास ही रख लिया क्योंकि किसी ने मुझे हेडिंग बनाने के लिए कहा नहीं था और न ही स्टोरी एडिटिंग के लिए मेरे पास आयी थी।

आधे घंटे बाद, वह स्टोरी पेज पर लगी। दो दो न्यूज़ एडिटर उसे लगाने में भिड़े थे। एक न्यूज़ एडिटर ने दूसरे से पूछा- हेडिंग क्या होनी चाहिए। उसने मुझसे भी पूछा- जो लगी है वह हेडिंग कैसी है। मैंने अपनी बनायीं हेडिंग वाला कागज़ उसे दे दिया। दोनो एक हेडिंग पर सहमत हुए।

इस बीच वैल्यू हेड अपनी हेडिंग ले के आ गये। उनकी वरिष्ठता को देखकर न्यूज़ एडिटरों ने उनकी हेडिंग लगा ली. हालाँकि यह साफ़ लग रहा था कि उन्हें हेडिंग पसंद नहीं आ रही थी.

 एक न्यूज़ एडिटर ने बोल ही दिया कि  पिछली हेडिंग भी ठीक लग रही थी। उसने फिर मुझसे भी पूछा और साथी न्यूज़ एडिटर से भी। उसने जाहिर कर दिया कि उसे मेरी हेडिंग पसंद आई।

अंततः मेरी हेडिंग लगाई गई ।

ऐसा तब हुआ जब न्यूज़ एडिटरों से मेरे सम्बन्ध बहुत अच्छे नहीं हैं।

अच्छे काम की कदर तो है।