ये पिछले महीने भर से बाहर गयी है। औरंगाबाद में बुजुर्ग फूफाजी का निधन हो गया। भैया के साथ चली गयी। शादी के बाद बारह साल में पहली बार अपने रिश्तेदारों से उनके घर में मिलना हुआ। नासिक और पुणे में भी बहुत से संबंधी रहते हैं। यह वहीं रुक गयी। नासिक होते हुए अभी पुणे में है। अभी कुछ दिन और रहने का प्रोग्राम है। बीच में सहेली के पास मुंंबई जाने का भी प्लान था। पता नहीं जाएगी कि नहीं। आज सासूजी से बात हुई। उनका कहना है कि बारिश में लौटना मुश्किल हो जाएगा। अभी पानी रुका है इसलिए मैंने अभी लौट आने की सलाह दी है। अपने एक फुफेरे भाई के यहां कुछ दिन रहकर शायद लौट आए।
इसके जाने से आजादी तो मिली है लेकिन पता है कि यह चांदनी चार दिनों की है। ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है। इस बीच काफी सारा काम कर सकता था। लेकिन हम तो ऐसे हैं भइया।
ज्यादातर समय खाना बनाने, खाने, टीवी देखने और सोने में गुजर रहा है। काम बोले तो एक भी नहीं हुआ। टेबल सुधरवा सकता था। कूलर साफ कर सकता था। सेजबहार में अपने घर को ठीक ठाक कर सकता था। मैगजीन निकालने की पहल कर सकता था।
पता नहीं अब कुछ करने की शायद हिम्मत नहीं हो रही। लगता है अब हाथ पांव मारने का कोई मतलब नहीं है।
चुपचाप नौकरी करते करते मर जाओ, जैसा कि ज्यादातर शुभचिंतक सलाह देते हैं।
लेकिन यह भी लग रहा है कि अब जो करूंगा, अधिक ठोस रूप में करूंगा। दफ्तर और घर की लादी हुई जिम्मेदारियों को ढोते हुए अपना काम करूंगा तो अधिक स्थायी रहेगा। क्योंकि दफ्तर न सही, घर की जिम्मेदारियां तो कहीं जाने वाली नहीं हैं।
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