Monday, 7 May 2012

मेले में एक शाम



आज एक मेले में घूमते हुए एक नाराज सेल्समैन से मुलाकात हो गयी। वह सब्जियां छीलने काटने के औजार बेच रहा था। ऐसे कई औजार हम पिछले कई सालों में खरीदकर ले जा चुके हैं। पत्नी ने कहा- इससे कुछ नहीं छिलाता भइया। सुनते ही वह नाराज हो गया। कहने लगा- ये सब कहने की बातें हैं मैडम। हर दूसरी महिला यही कहती है। आप थोड़ी देर खड़े रहकर खुद सुन लीजिए। तभी दो ग्राहक और आ गए। उनमें से एक ने किसी औजार के बारे में कहा कि इससे ठीक तरह काम नहीं होता। सेल्समैन ने फिर वही कहा- बोलने की बातें  हैं। हर दूसरा ग्राहक यही कहता है। हमें भी बहुत सी चीजें चलानी नहीं आतीं। इसका ये मतलब थोड़े है कि वह चीज ही खराब है। किसी को बुरा बोलने से पहले खुद को देख लेना चाहिए कि कहीं कमी हममें ही तो नहीं है।
सिलाई मशीन के स्टाल पर भी एक महिला ने सेल्समैन से कहा- आप तो एक्सपर्ट हो भइया। हमसे कहां होगा। उसने कहा-अपन कार भी लेते हैं तो पहले उसे चलाना सीखना पड़ता है। ये काम भी करते करते आएगा। चीज घर में रहेगी तो सीख भी जाएंगे।
पत्नी को सिलाई मशीनें पसंद आयीं। सब आठ दस हजार वाली थीं। उसने कहा कि तबीयत कुछ ठीक हो जाए तो लेने की सोचूंगी। मशीनें पसंद तो मुझे भी आयींं। बगैर पैडल वाली थीं। मोटर से चल रही थीं। सेल्समैन ने बताया कि घर आकर चलाकर बताएंगे। एक साल तक सर्विस भी देंगे। नाजुक सी दिख रही एक मशीन के बारे में उसने बताया कि मोटी सुई लगाकर इससे जींस भी सिल सकते हैं। क्रिएटिव लोगों के लिए यह मशीनें अच्छा रोजगार साबित हो सकती हैं। इनसे तरह तरह के टांके लग रहे थे और उनसे एक सेल्समैन डिजाइनें बनाकर दिखा रहा था।
एक सेल्समैन मल्टीपरपज टेबल बेच रहा था। उसे बिस्तर पर रखकर खाना खाया जा सकता था। जमीन पर रखकर लिखना पढऩा किया जा सकता था। उसकी फोल्डिंग टांगें एडजस्ट करके उसे डेस्क बनाया जा सकता था। मरीज उसे स्लोप की तरह इस्तेमाल करके पीठ दर्द से निजात पा सकते थे। उस पर पैर रखकर भी सोया जा सकता था। ऑफिस टेबल के ऊपर रखकर उसे लिखने पढऩे के लिए इस्तेमाल किया जा सकता था। स्टाल पर पोस्टर लगे थे जिसमें कुछ लोग टेबल का इस्तेमाल करते नजर आ रहे थे। इन लोगों में वह सेल्समैन भी था। वह संभवत: उस टेबल का अविष्कारक और दुकान का मालिक था। उसका वजन 110 किलो था। उसने टेबल का पूरा प्रदर्शन करके दिखाया। पालथी मारकर बैठा और टेबल पर लिखने की एक्टिंग की। उसने बताया-अगर मैं पालथी मारकर बैठ सकता हूं तो कोई भी बैठ सकता है। पत्नी को वह टेबल पसंद आया। लेकिन 1400 रुपए हमें ज्यादा लगे। पर फिर कहना होगा कि टेबल अच्छी थी। वह मध्यमवर्गीय घरों के लिए ठीक थी। देशी किस्म की टेबल। इसे अलग मटीरियल से बनाकर महंगे दामों पर भी बेचा जा सकता है।
फर्नीचर की एक दुकान पर गार्डन में रखी जाने वाली लोहे व लकड़ी वाली कुर्सियां और एक टेबल मिल रही थी। मेरे पास तेईस हजार रुपए और गार्डन वाला घर होता तो तुरंत खरीद लेता। मुझे ऐसी चेयर बहुत पसंद है। इसे देखकर ही रोमेंटिक सी फीलिंग होती है। हालांकि ऐसा कोई व्यक्तिगत अनुभव मेरा नहीं है। लेकिन तस्वीरों मेें और फिल्मों में अक्सर इन पर दो लोग प्रेम से बातें करते नजर आते हैं। एक झूला भी था जो इसका सपना है। वह अठारह हजार का था। मेरी कमाई अधिक होती तो वह भी ले लेता। देखकर अच्छा लगा कि चलो कोई तो बैठेगा इन पर।
फर्नीचर के एक बड़े स्टाल पर नब्बे हजार के डायनिंग टेबल पर बैठकर देखा। इसने कहा- रॉयल लुक है। मुझे रॉयल वॉयल पसंद नहीं है। मेरा टेस्ट दूसरा है। हालांकि किसी मॉल में दस हजार का सेंटर टेबल मुझे भी पसंद आया। बच्चों का डबल स्टोरी बेड प्लस स्टडी टेबल भी बहुत पसंद आया। बाजार में घूमो तो क्रिएटिविटी देखकर आनंद आ जाता है।
यहां कपड़े टांगने के लिए कई हुक वाली जंजीर मिल रही थी। अलमारी के भीतर थोड़ी सी जगह में बहुत सारे कपड़े टांगे जा सकते थे। सेल्समैन ने बताया कि अलमारी के भीतर कपड़े टांगने वाले हिस्से में इतनी हाइट होती है कि जंजीर से टंगे कपड़े टंगे रहेंगे। एक महिला ने बताया कि हम लोग इस हिस्से में काफी सारा सामान रखते हैं। इसके बाद इतनी हाइट नहीं बचती। सेल्समैन हंसने लगा। उसने कहा कि फिर कुछ नहीं किया जा सकता। हालांकि बाद में उसने कहा कि अलमारी के बाहर भी जंजीर का इस्तेमाल है। बारिश में कम जगह में कपड़े सुखाने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।
प्लास्टिक वाली चीजें जोडऩे के लिए एक सेल्समैन प्लास्टिक की छड़ें बेच रहा था। उसे पिघलाकर कहीं टपका दो। इससे प्लास्टिक की बाल्टी के छेद बंद किए जा सकते हैं और कपड़े टांगने का हुक दीवार से चिपकाया जा सकता है। सेल्समैन ने कंक्रीट के एक भारी ब्लॉक से दो हुक चिपका रखे थे और हुक की मदद से वह ब्लॉक उठाकर दिखा रहा था कि यह जोड़ मजबूत है। उसने पानी से भरी प्लास्टिक की बाल्टी में एक सूजा घुसा कर छेद कर दिया। पानी की धार बहने लगी। उसने प्लास्टिक की एक स्टिक को लाइटर से गर्म किया और छेद पर लगा दिया। छेद बंद हो गया। उसने बताया कि बहते पानी में भी यह काम करता है। बाल्टी में ढेर सारे छेद किए गए थे जैसे छलनी में होते हैं। उन्हें प्लास्टिक की स्टिक पिघलाकर बंद किया गया था। वह हर उत्सुक ग्राहक को ऐसा करके दिखा रहा था।
मेले में हमने कुछ खरीदा नहीं। बल्कि यह देखकर आए कि क्या क्या बिकता है। मुझे इस बात का अफसोस नहीं है कि मैं कुछ खरीद नहीं सका। अफसोस इस बात का है कि मैं कुछ बेच क्यों नहीं रहा हूं।

Sunday, 6 May 2012

सैर के वास्ते थोड़ी सी फजा और सही



सामाजिक पंचायतों के बारे में मुझे अधिक जानकारी नहीं है। जातीय समाज से ज्यादा लेना देना कभी नहीं रहा।
एक दोस्त पिछले दो दिनों से अपने समाज की पंचायत के बारे में बता रहा है। कल उसने साथ चलने का प्रस्ताव दिया था। उसने बताया कि ज्यादातर लोग शराब के नशे में रहते हैं। अंतरजातीय विवाह करने वालों को जमकर जलील करते हैं। उन्हें वापस समाज में मिलाने के लिए भारी भरकम पैसे लेते हैं।
दोस्त के बड़े भाई ने दूसरे समाज की लडक़ी से शादी की है। अपने पिताजी के विरोध के बाद भी वह नहीं माना। उनके परिवार का सामाजिक बहिष्कार चल रहा है। ये लोग समाज की बैठक में गए थे। समाज में मिलाने का आवेदन दिया। रात भर बैठक चलती रही। दूसरे दिन दस बजे नंबर आया। तब तक भाई भाभी आराम करने घर चले गए थे। बैठक के संचालक नाराज होने लगे। फिर किसी रिश्तेदार ने कहा कि इससे पहले अंतररजातीय विवाह के पांच मामले आ चुके हैं। इन लोगों ने इनमें से किसी को समाज में नहीं मिलाया। तुम्हारे साथ भी यही होगा। दोस्त अपने भाई भाभी को लौटा लाया। घर में उसके पिताजी नाराज हुए। दोस्त का कहना है कि घर में लडक़ी की शादी तो है नहीं। अब देखा जाएगा।
मुझे सुनकर अच्छा लगा कि एक नवविवाहित युवक ने समाज में न मिलाने का फैसला सुनकर हाथ जोड़ लिए और कहा कि यहां अपनी पत्नी का चीरहरण करवाने नहीं आया हूं। दंड के पैसे मैं साथ लाया हूं, समाज में मिलाना होगा तो सूचित कर देना। समाज के दबंगों के आगे लोग पैसे देने का विरोध नहीं कर पाते लेकिन अपनी बात कह तो रहे हैं।
पैसे लेकर क्या होगा? समाज के पदाधिकारी गुलछर्रे उड़ाएंगे। या अपना रुतबा बनाए रखने में उन्हें मदद मिलेगी। लडक़ी समाज में मिल भी गयी तो वह सजायाफ्ता अपराधी का जीवन गुजारेगी। यह कैसा मिलाना हुआ?
अंतरजातीय विवाह अपराध कैसे हो गया? मेरे खयाल से देश का कानून तो ऐसा नहीं कहता। मैं नहीं जानता कि सामाजिक फैसले के खिलाफ अदालत में जाने से क्या होगा। अगर समाज का यह ढकोसला खत्म होता है तो लोगों को अदालत में भी जाना चाहिए। मेरा खयाल है कि समाज इन लोगों से मिलकर नहीं बनता। वह समाज के उदार और व्यावहारिक लोगों से बनता है। समाज के बहुत से लोग हैं जो जातीय दायरे से ऊपर उठकर काम करते हैं। उन्हें समाज की परिभाषा को, उसके सोचने और काम करने के ढंग को बदलना चाहिए।
जातीय समाजों को अपने खान पान, गीत संगीत, पहनावे ओढ़ावे, अपनी भाषा को बचाना चाहिए। उसका संवर्धन करना चाहिए। लेकिन ऐसी संकीर्ण सोच होगी तो संवर्धन कैसे होगा।
इसीलिए तो आजाद खयाल कवि और कलाकार समाज की संकीर्णता पर चोट करते हैं। समाज लोगों को डराने और उनसे पैसे वसूलने के लिए तो नहीं होना चाहिए। वह लोगों की मदद के लिए होना चाहिए।
मेरे दोस्त के घर में उसकी भाभी के जरिए कितनी नयी चीजें आएंगी। नए व्यंजन बनेंगे। हो सकता है भाई नयी भाषा सीख ले। भाभी के घर वाले भी नयी बातें सीखेंगे। समाज के लोग ये क्यों नहीं सोचते?
कोई तानाशाह नहीं चाहता कि लोग अपने विवेक से काम करें। ऐसे ही लोग समाज में जन्नतें और दोजखें बनाकर रखते हैं। मगर बहुत से लोग फिर भी प्यार की राह पर चलते हैं जो धर्म और जाति की सीमाएं नहीं जानता।
गालिब ने क्या खूब कहा है-
क्यूं न दोजख को भी जन्नत  में मिला लें या रब
सैर के वास्ते थोड़ी सी फजा और सही

ढूंढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती

कल दफ्तर में बैठे बैठे भूख लग आई। नीचे दाबेली के ठेले पर पहुंचा। दो दाबेलियां लीं और बीस रुपए दिए। उसने तत्काल दस रुपए लौटा दिए। कहा कि आपके दस रुपए लेकर क्या करूंगा। कल को आप कहीं पांच रुपए में दाबेली खाओगे और मुझे गाली दोगे। 
वह गरीब आदमी दिख रहा था। कुछ देर पहले एक ग्राहक को बता रहा था कि निगम वाले आते हैं तो ठेला हटाना पड़ता है। एक दिन में दो-तीन बार आ जाते हैं। ग्राहक अपनी राय दे रहा था कि नई जगह तलाश लो। उसने कहा कि जमने में ही छह महीने लग जाएंगे। यानी वह परेशान भी था। 
फिर भी उसका ईमान सलामत था। 
मुझे कभी कभी ऐसे लोग मिलते रहते हैं। कितनी अजीब बात है कि ऐसे लोग कभी कभी मिलते हैं। 
यानी मैं जिस समाज में रह रहा हूं उसमें बेईमानी बहुत आम हो गयी है। जिस धंधे में हूं वहां बेईमानी आम है। आसपास पैसा पैसा करते रहने वाले लोग बहुत हैं। पैसा कैसे आ रहा है, इसकी बहुत चिंता नहीं करते। इनमें से बहुत से लोग किसी का भला करना बेवकूफी मानते हैं। और दूसरों को भी ऐसा करने से रोकते हैं। 
वैसे मैं जानता हूं कि अच्छा सोचने वाले और अच्छा करने वाले लोग भी कम नहीं हैं। शायद मेरी ही पहुंच उन तक कम है। 












Friday, 2 September 2011