Sunday, 6 May 2012

ढूंढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती

कल दफ्तर में बैठे बैठे भूख लग आई। नीचे दाबेली के ठेले पर पहुंचा। दो दाबेलियां लीं और बीस रुपए दिए। उसने तत्काल दस रुपए लौटा दिए। कहा कि आपके दस रुपए लेकर क्या करूंगा। कल को आप कहीं पांच रुपए में दाबेली खाओगे और मुझे गाली दोगे। 
वह गरीब आदमी दिख रहा था। कुछ देर पहले एक ग्राहक को बता रहा था कि निगम वाले आते हैं तो ठेला हटाना पड़ता है। एक दिन में दो-तीन बार आ जाते हैं। ग्राहक अपनी राय दे रहा था कि नई जगह तलाश लो। उसने कहा कि जमने में ही छह महीने लग जाएंगे। यानी वह परेशान भी था। 
फिर भी उसका ईमान सलामत था। 
मुझे कभी कभी ऐसे लोग मिलते रहते हैं। कितनी अजीब बात है कि ऐसे लोग कभी कभी मिलते हैं। 
यानी मैं जिस समाज में रह रहा हूं उसमें बेईमानी बहुत आम हो गयी है। जिस धंधे में हूं वहां बेईमानी आम है। आसपास पैसा पैसा करते रहने वाले लोग बहुत हैं। पैसा कैसे आ रहा है, इसकी बहुत चिंता नहीं करते। इनमें से बहुत से लोग किसी का भला करना बेवकूफी मानते हैं। और दूसरों को भी ऐसा करने से रोकते हैं। 
वैसे मैं जानता हूं कि अच्छा सोचने वाले और अच्छा करने वाले लोग भी कम नहीं हैं। शायद मेरी ही पहुंच उन तक कम है। 












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