ऐसा नहीं कि ये सब सूने इलाकों में होता है. घरों में, दफ्तर में, स्कूल कालेज में बगैर डंडे के ये सब होता रहता है. नौकरी का लालच देकर या नौकरी से निकालने की धमकी देकर कर्मचारियों के आत्मसम्मान से लेकर शील पर हमले होते रहते हैं. घरों में रिश्ते नातों के जंगल में, मजबूर बच्चों और औरतों के साथ क्या नहीं होता. शहरी भेड़ियों को खुश नहीं होना चाहिए कि उन्हें कोई नहीं देख रहा है.
एक ही जरूरत कितने अलग अलग तरह से पूरी होती है. एक आदमी घर में प्यार से खाना खाता है.एक आदमी दूसरे के घर में भी प्रेम से खाना खाता है. एक होटल में आर्डर देकर खाता है. एक सड़क पर मांग कर खाता है. कुछ ठग कर और कुछ लूट कर खाते हैं. ऐसा ही दूसरी जरूरतों के बारे में भी है. ये समाज की गैर बराबरी है जो दूर होती नहीं दिखती. इस गैर बराबरी का जिन्हें फायदा मिल रहा है वे क्यों इसे दूर करने लगे.
ये समाज के पाखंड का भी नतीजा है कि बच्चे शहर छोड़कर आउटर की राह पकड़ रहे हैं. समाज को प्रेम को मान्यता देनी चाहिए. कुछ दोस्तों का सुझाव है कि देश के कुछ महानगरों की तरह यहाँ भी प्रेमियों के लिए सेफ ज़ोन बनाने चाहिए. जोन तो प्रेमियों ने बना लिए हैं, उन्हें सेफ करने की ज़रुरत है.
एक बात और. प्रेम शब्द को मीडिया ने बहुत सस्ता बना दिया है. मुझे हर मामले में प्रेम शब्द का इस्तेमाल नहीं जंचता. नशेडी, हत्यारे, अय्याश सबके लिए प्रेमी शब्द का इस्तेमाल किया जाता है. अगली पट गयी है या माल को लेकर जाऊंगा जैसी भाषा में बात करने वाले के लिए भी प्रेम और प्रेमी शब्द का इस्तेमाल किया जाता है. प्रेम न हुआ
राज्य सरकार का साहित्य पुरस्कार हो गया.
एक बात और. ये हर बच्चे को देखना चाहिए कि वह कहाँ सेफ है और कहाँ खतरे में. प्रेम करने जा रहे हो, इतनी अकल है. थोड़ी अकल इधर भी लगा लो. प्रेम अँधा होता है, दुनिया अंधी नहीं होती. लोग तो देखते रहते हैं कि आप कहाँ जा रहे हो, क्यों जा रहे हो. सुनसान में जाने वालों को इतना अहसास तो हो जाता है कि ये जगह सेफ नहीं है. उसके बाद प्राथमिकता तय करना आपका काम है. बहुत से इलाकों के बारे में कम से कम पुरुष साथी को पता होता है कि वह बदनाम और असुरक्षित इलाका है. यह उसकी ग़लती है कि वह उसके बाद भी वहां जाने का फैसला करता है.
माँ बाप को भी बच्चों की गतिविधियों से पता तो चल जाता है कि वे बड़े हो रहे हैं. उन्हें रोकने टोकने के बजाय सुरक्षित रहना सिखाना चाहिए.
एक बात और. ये हर बच्चे को देखना चाहिए कि वह कहाँ सेफ है और कहाँ खतरे में. प्रेम करने जा रहे हो, इतनी अकल है. थोड़ी अकल इधर भी लगा लो. प्रेम अँधा होता है, दुनिया अंधी नहीं होती. लोग तो देखते रहते हैं कि आप कहाँ जा रहे हो, क्यों जा रहे हो. सुनसान में जाने वालों को इतना अहसास तो हो जाता है कि ये जगह सेफ नहीं है. उसके बाद प्राथमिकता तय करना आपका काम है. बहुत से इलाकों के बारे में कम से कम पुरुष साथी को पता होता है कि वह बदनाम और असुरक्षित इलाका है. यह उसकी ग़लती है कि वह उसके बाद भी वहां जाने का फैसला करता है.
माँ बाप को भी बच्चों की गतिविधियों से पता तो चल जाता है कि वे बड़े हो रहे हैं. उन्हें रोकने टोकने के बजाय सुरक्षित रहना सिखाना चाहिए.
भेड़ियों से ये उम्मीद बेमानी है कि वे घास खाकर गुज़ारा कर लेंगे.
ये तो मेमनों को समझना होगा ·कि उधर खतरा है.
००००००००
No comments:
Post a Comment