Friday, 18 May 2012

रामचरण निर्मलकर



रामचरण निर्मलकर नहीं रहे। पिछले बुधवार को उनका निधन हो गया। छत्तीसगढ़ में उन्हें जानने वालों की कमी नहीं थी। लेकिन ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं कि उनके पास क्या था जो उन्होंने खो दिया।

तीन दशक तक छत्तीसगढ़ में नाचा किया। तीन दशक तक हबीब तनवीर के साथ देश-विदेश में नाटक खेले। जीवन के आखिरी दिन उसी गरीबी में, उसी सरलता, सहजता से गुजारे।

उनसे मिलने दो तीन बार उनके घर गया था। इतने बरस दुनिया घूमने के बाद भी उनकी भाषा जस की तस थी। कोई उनसे बात करके पता नहीं लगा सकता था कि ये आदमी इतने साल न सिर्फ दिल्ली -मुंबई बल्कि विदेशों में भी जाता रहा है। 
सिर्फ भाषा नहीं, उनकी सहजता और सरलता पर भी बाहर का कोई असर नहीं दिखता था।

उनका साक्षात्कार लेते हुए मैंने पूछा कि शुरुआती दिनों में नाचा पार्टी में कैसे नाटक खेलते थे। वे एक नाटक की कहानी बताने लगे। बताते बतातें उनकी आंखों में आंसू आ गए। ऐसे संवेदनशील इंसान थे। अब कौन किसे कहानियां सुनाता है? और कहानियां सुनाते सुनाते कितनी आंखें गीली हो जाती हैं?

उनमें गजब का आत्मविश्वास था। इतने साल बाहर रहने से आदमी में गजब का आत्मविश्वास आ ही जाना चाहिए। लेकिन निर्मलकर जी के आत्मविश्वास को देखकर कहीं से नहीं लगता था कि यह दुनिया घूमकर कमाया गया है। लगता था कि यह छत्तीसगढ़ में ही रहकर, छत्तीस साल तक नाचा में काम करके कमाया गया आत्मविश्वास है। दुनिया को तो वे कुछ देने गए थे।

वे एक दुर्लभ छत्तीसगढिय़ा थे।

धमतरी से आते वक्त मैं जहां कहीं भीड़ देखता हूं समझ जाता हूं कि यह दारू का ठेका होगा और आसपास मछली अंडे की दुकानें होंगी। अगर कहीं लाइब्रेरी जैसी कोई जगह होगी भी तो पता नहीं चलता। निर्मलकर जी भी ऐसी ही लाइब्रेरी थे। बहुतों को उनका पता ही नहीं चला। जिन्हें पता था उन्होंने भी उनका कोई फायदा नहीं उठाया।

उन्होंने एक अद्भुत जीवन जिया। कौन सोच सकता है कि बरोंडा के एक बुजुर्ग के पास लंदन में खींची गई अपनी तस्वीर होगी जो वहां के एक टेबलाइड में शायद फ्रंट पेज पर फुल पेज छपी थी। शशिकपूर केसाथ उनकी तस्वीर थी। संजना कपूर के साथ भी। शेखर कपूर के साथ भी। हबीब तनवीर के साथ भी और नाटक खेलते समय की तो दर्जनों तस्वीरें थीं।

जितना बैलगाड़ी नहीं चढ़ा, उससे ज्यादा हवाई जहाज में चढ़ा हूं, यह बताते समय कहीं से तो उनकी आवाज में घमंड की झलक मिलती। वे यह बात चुटकी लेते हुए बताते थे। फिल्म और रंगकर्म के कई महारथियों के साथ मुलाकातों के उनके पास असंख्य किस्से थे। कुछ लोगों से उनकी सीमित मुलाकातें हुईं। खोदकर कुछ निकालने की कोशिश की तो बहुत सहजता से उन्होंने कह दिया कि उनसे बहुत ज्यादा मिलना नहीं हुआ।

छत्तीसगढ़ के प्रति मेरे मन में बचपन से प्रेम भी है और गौरव भी। रामचरण जी से मिलने के बाद यह हजार गुना हो गया है।

उन्हें पुन: मेरी विनम्र श्रद्धांजली।


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