सामाजिक पंचायतों के बारे में मुझे अधिक जानकारी नहीं है। जातीय समाज से ज्यादा लेना देना कभी नहीं रहा।
एक दोस्त पिछले दो दिनों से अपने समाज की पंचायत के बारे में बता रहा है। कल उसने साथ चलने का प्रस्ताव दिया था। उसने बताया कि ज्यादातर लोग शराब के नशे में रहते हैं। अंतरजातीय विवाह करने वालों को जमकर जलील करते हैं। उन्हें वापस समाज में मिलाने के लिए भारी भरकम पैसे लेते हैं।
दोस्त के बड़े भाई ने दूसरे समाज की लडक़ी से शादी की है। अपने पिताजी के विरोध के बाद भी वह नहीं माना। उनके परिवार का सामाजिक बहिष्कार चल रहा है। ये लोग समाज की बैठक में गए थे। समाज में मिलाने का आवेदन दिया। रात भर बैठक चलती रही। दूसरे दिन दस बजे नंबर आया। तब तक भाई भाभी आराम करने घर चले गए थे। बैठक के संचालक नाराज होने लगे। फिर किसी रिश्तेदार ने कहा कि इससे पहले अंतररजातीय विवाह के पांच मामले आ चुके हैं। इन लोगों ने इनमें से किसी को समाज में नहीं मिलाया। तुम्हारे साथ भी यही होगा। दोस्त अपने भाई भाभी को लौटा लाया। घर में उसके पिताजी नाराज हुए। दोस्त का कहना है कि घर में लडक़ी की शादी तो है नहीं। अब देखा जाएगा।
मुझे सुनकर अच्छा लगा कि एक नवविवाहित युवक ने समाज में न मिलाने का फैसला सुनकर हाथ जोड़ लिए और कहा कि यहां अपनी पत्नी का चीरहरण करवाने नहीं आया हूं। दंड के पैसे मैं साथ लाया हूं, समाज में मिलाना होगा तो सूचित कर देना। समाज के दबंगों के आगे लोग पैसे देने का विरोध नहीं कर पाते लेकिन अपनी बात कह तो रहे हैं।
पैसे लेकर क्या होगा? समाज के पदाधिकारी गुलछर्रे उड़ाएंगे। या अपना रुतबा बनाए रखने में उन्हें मदद मिलेगी। लडक़ी समाज में मिल भी गयी तो वह सजायाफ्ता अपराधी का जीवन गुजारेगी। यह कैसा मिलाना हुआ?
अंतरजातीय विवाह अपराध कैसे हो गया? मेरे खयाल से देश का कानून तो ऐसा नहीं कहता। मैं नहीं जानता कि सामाजिक फैसले के खिलाफ अदालत में जाने से क्या होगा। अगर समाज का यह ढकोसला खत्म होता है तो लोगों को अदालत में भी जाना चाहिए। मेरा खयाल है कि समाज इन लोगों से मिलकर नहीं बनता। वह समाज के उदार और व्यावहारिक लोगों से बनता है। समाज के बहुत से लोग हैं जो जातीय दायरे से ऊपर उठकर काम करते हैं। उन्हें समाज की परिभाषा को, उसके सोचने और काम करने के ढंग को बदलना चाहिए।
जातीय समाजों को अपने खान पान, गीत संगीत, पहनावे ओढ़ावे, अपनी भाषा को बचाना चाहिए। उसका संवर्धन करना चाहिए। लेकिन ऐसी संकीर्ण सोच होगी तो संवर्धन कैसे होगा।
इसीलिए तो आजाद खयाल कवि और कलाकार समाज की संकीर्णता पर चोट करते हैं। समाज लोगों को डराने और उनसे पैसे वसूलने के लिए तो नहीं होना चाहिए। वह लोगों की मदद के लिए होना चाहिए।
मेरे दोस्त के घर में उसकी भाभी के जरिए कितनी नयी चीजें आएंगी। नए व्यंजन बनेंगे। हो सकता है भाई नयी भाषा सीख ले। भाभी के घर वाले भी नयी बातें सीखेंगे। समाज के लोग ये क्यों नहीं सोचते?
कोई तानाशाह नहीं चाहता कि लोग अपने विवेक से काम करें। ऐसे ही लोग समाज में जन्नतें और दोजखें बनाकर रखते हैं। मगर बहुत से लोग फिर भी प्यार की राह पर चलते हैं जो धर्म और जाति की सीमाएं नहीं जानता।
गालिब ने क्या खूब कहा है-
क्यूं न दोजख को भी जन्नत में मिला लें या रब
सैर के वास्ते थोड़ी सी फजा और सही
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