Tuesday, 29 May 2012

शहर में घोटाले, आउटर में प्रेम




बुनियादी जरूरतों को लेकर लोगों को कहाँ कहाँ भटकना पड़ता है. और कैसे कैसे हादसे उनके साथ होते हैं. एक लड़का लड़की रात को एक सुनसान इलाके में चले गए. उन पर इन्सान की शक्ल वाले भेड़ियों ने हमला कर दिया. ये वारदात तो सामने आ गयी. आसपास के लोग जानते हैं कि यहाँ ऐसा होता ही रहता है. पता नहीं कब तक होता रहेगा. ये कैसी अंधेर नगरी है. यहाँ घोटाले तो शहर में होते हैं, प्रेम आउटर में होता है. यहाँ बेईमानों  को पद दिए जाते हैं. और प्रेम करने वालों को साल के एक दिन डंडे मारे जाते हैं. 

ऐसा नहीं कि ये सब सूने इलाकों में होता है. घरों में, दफ्तर में, स्कूल कालेज में बगैर डंडे के ये सब होता रहता है. नौकरी का लालच देकर या नौकरी से निकालने की धमकी देकर कर्मचारियों के आत्मसम्मान से लेकर शील पर हमले होते रहते हैं. घरों में रिश्ते नातों के जंगल में, मजबूर बच्चों और औरतों के साथ क्या नहीं होता. शहरी भेड़ियों को खुश नहीं होना चाहिए कि उन्हें कोई नहीं देख रहा है. 

एक ही जरूरत कितने अलग अलग तरह से पूरी होती है. एक आदमी घर में प्यार से खाना खाता है.एक आदमी दूसरे के घर में भी प्रेम से खाना खाता है. एक होटल में आर्डर देकर खाता है. एक सड़क पर मांग कर खाता है. कुछ ठग कर और कुछ लूट कर खाते हैं. ऐसा ही दूसरी जरूरतों के बारे में भी है. ये समाज की गैर बराबरी है जो दूर होती नहीं दिखती. इस गैर बराबरी का जिन्हें फायदा मिल रहा है वे क्यों इसे दूर करने लगे. 

ये समाज के पाखंड का भी नतीजा है कि बच्चे शहर छोड़कर आउटर की राह पकड़ रहे हैं. समाज को प्रेम को मान्यता देनी चाहिए. कुछ दोस्तों का सुझाव है कि देश के कुछ महानगरों की तरह यहाँ भी प्रेमियों के लिए सेफ ज़ोन बनाने चाहिए. जोन तो प्रेमियों ने बना लिए हैं, उन्हें सेफ करने की ज़रुरत है. 

एक बात और. प्रेम शब्द को मीडिया ने बहुत सस्ता बना दिया है.  मुझे हर मामले में प्रेम शब्द का इस्तेमाल नहीं जंचता. नशेडी, हत्यारे, अय्याश सबके लिए प्रेमी शब्द का इस्तेमाल किया जाता है. अगली पट गयी है या माल को लेकर जाऊंगा जैसी भाषा में बात करने वाले के लिए भी प्रेम और प्रेमी  शब्द का इस्तेमाल किया जाता है. प्रेम न हुआ  राज्य  सरकार का साहित्य पुरस्कार हो गया.

एक बात और. ये हर बच्चे को देखना चाहिए कि वह कहाँ सेफ है और कहाँ खतरे में. प्रेम करने जा रहे हो, इतनी अकल है. थोड़ी अकल इधर भी लगा लो. प्रेम अँधा होता है, दुनिया अंधी नहीं होती. लोग तो देखते रहते हैं कि आप कहाँ जा रहे हो, क्यों जा रहे हो. सुनसान में जाने वालों को इतना अहसास तो हो जाता है कि ये जगह सेफ नहीं है. उसके बाद प्राथमिकता तय करना आपका काम है. बहुत से इलाकों के बारे में कम से कम पुरुष साथी को पता होता है कि वह बदनाम और असुरक्षित इलाका है. यह उसकी ग़लती है कि वह उसके बाद भी वहां जाने का फैसला करता है. 

माँ बाप को भी बच्चों की गतिविधियों से पता तो चल जाता है कि वे बड़े हो रहे हैं. उन्हें रोकने टोकने के बजाय सुरक्षित रहना सिखाना चाहिए.

भेड़ियों से ये उम्मीद बेमानी है कि वे घास खाकर गुज़ारा कर लेंगे. 
ये तो मेमनों को समझना होगा ·कि उधर खतरा है. 

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Saturday, 19 May 2012

उषा




उषा हमारे घर काम करती है. मुझे लगता है वह हमारे घर की सदस्य है. बल्कि हमारे घर की ज़रुरत है. उसके आने से घर का अकेलापन दूर होता है. खासकर पत्नी का. उषा उम्र में उससे बहुत छोटी है लेकिन उसकी सहेली जैसी है. एक  बार दोना साथ साथ मौल घूमने भी जा चुके हैं. आपस में बहुत सी बातें शेयर करते रहते हैं. 

उषा बहुत सुंदर है. ऐसा पत्नी कई बार कह चुकी है. हम लोगों ने उसकी फोटो भी खींची है. 

उषा को लेकर मन में कई तरह के विचार आते हैं. इतनी सुंदर लड़की को देखकर ये तो लगेगा ही के काश ये मेरी दोस्त होती. उषा के आने से लगता है के अपने बच्चे की  कमी दूर हो गयी. हमारी सही उम्र में शादी हो गयी होती तो बेटी इतनी बड़ी होती. उषा के आने से मुझे लगता है के मुझे समझने वाला कोई आ गया है. वह इसी धरती की बेटी है. छत्तीसगढ़ के लोग आमतौर पर मानवीय होते हैं. वे काम न करने वालों से बहुत बेदर्दी से पेश नहीं आते. हालाँकि छत्तीसगढ़ की महिलाओं को लेकर मैं किसी ग़लतफ़हमी में नहीं हूँ. सब्जी बाजार में उनका दुर्गा चंडी वाला रूप दिखता है. पर उषा नर्म दिल लड़की है. उसके आने से मुझे एक अंदरूनी सहारा मिलता है. एक नैतिक समर्थन मिलता है. 

उषा के आने का समय होता है और मुझे असमय उठाये जाने का समय होता है. मैं रात की ड्यूटी से लौटकर खाना खाता हूँ, टीवी देखता हूँ फिर सोता हूँ. सुबह अधूरी नींद में उठना पड़ता है. डांट खाते खाते कुछ कुछ काम करता हूँ या डांट खाकर भी नहीं करता. वह मुझे आलसी समझती होगी. हालाँकि मैं हूँ भी आलसी. पर कोई ऐसा समझे तो फिर भी बुरा लगता है. 

उषा के घर में वह है और उसकी माँ है. बीच में उसे देखने लड़के वाले आये थे. पहले सुना के रिश्ता पक्का हो गया. फिर पता चला के इन लोगों ने ही रिश्ता तोड़ दिया. लड़का शराब पीता था. उषा ने बताया के इसके बाद लड़का उसकी माँ को रिश्ता न तोड़ने के लिए धमका रहा है. अब उस बारे में बात नहीं होती. 

कभी कभी मै घर में अकेले होता हूँ जब उषा आती है. सहमी सी रहती है. चुपचाप काम करके निकल जाती है. मैं कभी कभी घर से बाहर निकलकर बैठ जाता हूँ. भीतर रहता हूँ तो दोनों असहज हो जाते हैं. 

मुझे उसका झाड़ू पोछा करना अच्छा नहीं लगता. हालांकि मैं भी तो नौकरी करता हूँ. मुझे भी कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता है. मेरी माँ ने भी तो जीवन भर नौकरी की. मेरी बहने भी तो टीचर के रूप में काम करती हैं. चलो उषा भी काम करती है तो क्या बुरा है.  ईश्वर करे हमसे उसके साथ कोई ज्यादती न हो. 

कभी कभी मुझे लगता है के उस पर काम ज्यादा हो गया है. तब मुझे अच्छा नहीं लगता. वह हमारे अलावा नीचे रहने वाले मकान मालिक  के घर भी काम करती है और मोहल्ले के दो और घरों में भी. नन्ही सी जान और इतना काम. 

उसने दो महीने पहले मकान मालिक से पुरानी साइकिल खरीदी है. मुझे यह बहुत अच्छा लगा. उषा शौकीन है. पत्नी ने बताया के उसके पास एक दो महंगे सूट हैं. उसने शायद पार्लर से भवे भी बनवा रखी हैं. कलाइयों में चूड़ियाँ और पावों में पायल तो खैर वह पहनती ही है. मैंने नज़रें बचाकर देखा है के वह बिंदी भी लम्बी सी लगाती है और उसकी हेयर स्टाइल बदलती रहती है. 

उषा इतनी सुंदर है. युवा है. अकेली है. क्या उसका कोई दोस्त नहीं होगा?

अभी तक तो इसके बारे में सुना नहीं. पत्नी को कुछ पता होता तो वह ज़रूर बताती. 

मेरी ईर्ष्या कहती है के मत ही हो कोई लड़का उसका दोस्त. 

लेकिन बड़े होने का तकाजा है के मैं उसके लिए एक बहुत अच्छे जीवन साथी की कामना करूं. भगवान शिव उसकी मनोकामना पूरी करें. 

Friday, 18 May 2012

रामचरण निर्मलकर



रामचरण निर्मलकर नहीं रहे। पिछले बुधवार को उनका निधन हो गया। छत्तीसगढ़ में उन्हें जानने वालों की कमी नहीं थी। लेकिन ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं कि उनके पास क्या था जो उन्होंने खो दिया।

तीन दशक तक छत्तीसगढ़ में नाचा किया। तीन दशक तक हबीब तनवीर के साथ देश-विदेश में नाटक खेले। जीवन के आखिरी दिन उसी गरीबी में, उसी सरलता, सहजता से गुजारे।

उनसे मिलने दो तीन बार उनके घर गया था। इतने बरस दुनिया घूमने के बाद भी उनकी भाषा जस की तस थी। कोई उनसे बात करके पता नहीं लगा सकता था कि ये आदमी इतने साल न सिर्फ दिल्ली -मुंबई बल्कि विदेशों में भी जाता रहा है। 
सिर्फ भाषा नहीं, उनकी सहजता और सरलता पर भी बाहर का कोई असर नहीं दिखता था।

उनका साक्षात्कार लेते हुए मैंने पूछा कि शुरुआती दिनों में नाचा पार्टी में कैसे नाटक खेलते थे। वे एक नाटक की कहानी बताने लगे। बताते बतातें उनकी आंखों में आंसू आ गए। ऐसे संवेदनशील इंसान थे। अब कौन किसे कहानियां सुनाता है? और कहानियां सुनाते सुनाते कितनी आंखें गीली हो जाती हैं?

उनमें गजब का आत्मविश्वास था। इतने साल बाहर रहने से आदमी में गजब का आत्मविश्वास आ ही जाना चाहिए। लेकिन निर्मलकर जी के आत्मविश्वास को देखकर कहीं से नहीं लगता था कि यह दुनिया घूमकर कमाया गया है। लगता था कि यह छत्तीसगढ़ में ही रहकर, छत्तीस साल तक नाचा में काम करके कमाया गया आत्मविश्वास है। दुनिया को तो वे कुछ देने गए थे।

वे एक दुर्लभ छत्तीसगढिय़ा थे।

धमतरी से आते वक्त मैं जहां कहीं भीड़ देखता हूं समझ जाता हूं कि यह दारू का ठेका होगा और आसपास मछली अंडे की दुकानें होंगी। अगर कहीं लाइब्रेरी जैसी कोई जगह होगी भी तो पता नहीं चलता। निर्मलकर जी भी ऐसी ही लाइब्रेरी थे। बहुतों को उनका पता ही नहीं चला। जिन्हें पता था उन्होंने भी उनका कोई फायदा नहीं उठाया।

उन्होंने एक अद्भुत जीवन जिया। कौन सोच सकता है कि बरोंडा के एक बुजुर्ग के पास लंदन में खींची गई अपनी तस्वीर होगी जो वहां के एक टेबलाइड में शायद फ्रंट पेज पर फुल पेज छपी थी। शशिकपूर केसाथ उनकी तस्वीर थी। संजना कपूर के साथ भी। शेखर कपूर के साथ भी। हबीब तनवीर के साथ भी और नाटक खेलते समय की तो दर्जनों तस्वीरें थीं।

जितना बैलगाड़ी नहीं चढ़ा, उससे ज्यादा हवाई जहाज में चढ़ा हूं, यह बताते समय कहीं से तो उनकी आवाज में घमंड की झलक मिलती। वे यह बात चुटकी लेते हुए बताते थे। फिल्म और रंगकर्म के कई महारथियों के साथ मुलाकातों के उनके पास असंख्य किस्से थे। कुछ लोगों से उनकी सीमित मुलाकातें हुईं। खोदकर कुछ निकालने की कोशिश की तो बहुत सहजता से उन्होंने कह दिया कि उनसे बहुत ज्यादा मिलना नहीं हुआ।

छत्तीसगढ़ के प्रति मेरे मन में बचपन से प्रेम भी है और गौरव भी। रामचरण जी से मिलने के बाद यह हजार गुना हो गया है।

उन्हें पुन: मेरी विनम्र श्रद्धांजली।


Monday, 7 May 2012

मेले में एक शाम



आज एक मेले में घूमते हुए एक नाराज सेल्समैन से मुलाकात हो गयी। वह सब्जियां छीलने काटने के औजार बेच रहा था। ऐसे कई औजार हम पिछले कई सालों में खरीदकर ले जा चुके हैं। पत्नी ने कहा- इससे कुछ नहीं छिलाता भइया। सुनते ही वह नाराज हो गया। कहने लगा- ये सब कहने की बातें हैं मैडम। हर दूसरी महिला यही कहती है। आप थोड़ी देर खड़े रहकर खुद सुन लीजिए। तभी दो ग्राहक और आ गए। उनमें से एक ने किसी औजार के बारे में कहा कि इससे ठीक तरह काम नहीं होता। सेल्समैन ने फिर वही कहा- बोलने की बातें  हैं। हर दूसरा ग्राहक यही कहता है। हमें भी बहुत सी चीजें चलानी नहीं आतीं। इसका ये मतलब थोड़े है कि वह चीज ही खराब है। किसी को बुरा बोलने से पहले खुद को देख लेना चाहिए कि कहीं कमी हममें ही तो नहीं है।
सिलाई मशीन के स्टाल पर भी एक महिला ने सेल्समैन से कहा- आप तो एक्सपर्ट हो भइया। हमसे कहां होगा। उसने कहा-अपन कार भी लेते हैं तो पहले उसे चलाना सीखना पड़ता है। ये काम भी करते करते आएगा। चीज घर में रहेगी तो सीख भी जाएंगे।
पत्नी को सिलाई मशीनें पसंद आयीं। सब आठ दस हजार वाली थीं। उसने कहा कि तबीयत कुछ ठीक हो जाए तो लेने की सोचूंगी। मशीनें पसंद तो मुझे भी आयींं। बगैर पैडल वाली थीं। मोटर से चल रही थीं। सेल्समैन ने बताया कि घर आकर चलाकर बताएंगे। एक साल तक सर्विस भी देंगे। नाजुक सी दिख रही एक मशीन के बारे में उसने बताया कि मोटी सुई लगाकर इससे जींस भी सिल सकते हैं। क्रिएटिव लोगों के लिए यह मशीनें अच्छा रोजगार साबित हो सकती हैं। इनसे तरह तरह के टांके लग रहे थे और उनसे एक सेल्समैन डिजाइनें बनाकर दिखा रहा था।
एक सेल्समैन मल्टीपरपज टेबल बेच रहा था। उसे बिस्तर पर रखकर खाना खाया जा सकता था। जमीन पर रखकर लिखना पढऩा किया जा सकता था। उसकी फोल्डिंग टांगें एडजस्ट करके उसे डेस्क बनाया जा सकता था। मरीज उसे स्लोप की तरह इस्तेमाल करके पीठ दर्द से निजात पा सकते थे। उस पर पैर रखकर भी सोया जा सकता था। ऑफिस टेबल के ऊपर रखकर उसे लिखने पढऩे के लिए इस्तेमाल किया जा सकता था। स्टाल पर पोस्टर लगे थे जिसमें कुछ लोग टेबल का इस्तेमाल करते नजर आ रहे थे। इन लोगों में वह सेल्समैन भी था। वह संभवत: उस टेबल का अविष्कारक और दुकान का मालिक था। उसका वजन 110 किलो था। उसने टेबल का पूरा प्रदर्शन करके दिखाया। पालथी मारकर बैठा और टेबल पर लिखने की एक्टिंग की। उसने बताया-अगर मैं पालथी मारकर बैठ सकता हूं तो कोई भी बैठ सकता है। पत्नी को वह टेबल पसंद आया। लेकिन 1400 रुपए हमें ज्यादा लगे। पर फिर कहना होगा कि टेबल अच्छी थी। वह मध्यमवर्गीय घरों के लिए ठीक थी। देशी किस्म की टेबल। इसे अलग मटीरियल से बनाकर महंगे दामों पर भी बेचा जा सकता है।
फर्नीचर की एक दुकान पर गार्डन में रखी जाने वाली लोहे व लकड़ी वाली कुर्सियां और एक टेबल मिल रही थी। मेरे पास तेईस हजार रुपए और गार्डन वाला घर होता तो तुरंत खरीद लेता। मुझे ऐसी चेयर बहुत पसंद है। इसे देखकर ही रोमेंटिक सी फीलिंग होती है। हालांकि ऐसा कोई व्यक्तिगत अनुभव मेरा नहीं है। लेकिन तस्वीरों मेें और फिल्मों में अक्सर इन पर दो लोग प्रेम से बातें करते नजर आते हैं। एक झूला भी था जो इसका सपना है। वह अठारह हजार का था। मेरी कमाई अधिक होती तो वह भी ले लेता। देखकर अच्छा लगा कि चलो कोई तो बैठेगा इन पर।
फर्नीचर के एक बड़े स्टाल पर नब्बे हजार के डायनिंग टेबल पर बैठकर देखा। इसने कहा- रॉयल लुक है। मुझे रॉयल वॉयल पसंद नहीं है। मेरा टेस्ट दूसरा है। हालांकि किसी मॉल में दस हजार का सेंटर टेबल मुझे भी पसंद आया। बच्चों का डबल स्टोरी बेड प्लस स्टडी टेबल भी बहुत पसंद आया। बाजार में घूमो तो क्रिएटिविटी देखकर आनंद आ जाता है।
यहां कपड़े टांगने के लिए कई हुक वाली जंजीर मिल रही थी। अलमारी के भीतर थोड़ी सी जगह में बहुत सारे कपड़े टांगे जा सकते थे। सेल्समैन ने बताया कि अलमारी के भीतर कपड़े टांगने वाले हिस्से में इतनी हाइट होती है कि जंजीर से टंगे कपड़े टंगे रहेंगे। एक महिला ने बताया कि हम लोग इस हिस्से में काफी सारा सामान रखते हैं। इसके बाद इतनी हाइट नहीं बचती। सेल्समैन हंसने लगा। उसने कहा कि फिर कुछ नहीं किया जा सकता। हालांकि बाद में उसने कहा कि अलमारी के बाहर भी जंजीर का इस्तेमाल है। बारिश में कम जगह में कपड़े सुखाने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।
प्लास्टिक वाली चीजें जोडऩे के लिए एक सेल्समैन प्लास्टिक की छड़ें बेच रहा था। उसे पिघलाकर कहीं टपका दो। इससे प्लास्टिक की बाल्टी के छेद बंद किए जा सकते हैं और कपड़े टांगने का हुक दीवार से चिपकाया जा सकता है। सेल्समैन ने कंक्रीट के एक भारी ब्लॉक से दो हुक चिपका रखे थे और हुक की मदद से वह ब्लॉक उठाकर दिखा रहा था कि यह जोड़ मजबूत है। उसने पानी से भरी प्लास्टिक की बाल्टी में एक सूजा घुसा कर छेद कर दिया। पानी की धार बहने लगी। उसने प्लास्टिक की एक स्टिक को लाइटर से गर्म किया और छेद पर लगा दिया। छेद बंद हो गया। उसने बताया कि बहते पानी में भी यह काम करता है। बाल्टी में ढेर सारे छेद किए गए थे जैसे छलनी में होते हैं। उन्हें प्लास्टिक की स्टिक पिघलाकर बंद किया गया था। वह हर उत्सुक ग्राहक को ऐसा करके दिखा रहा था।
मेले में हमने कुछ खरीदा नहीं। बल्कि यह देखकर आए कि क्या क्या बिकता है। मुझे इस बात का अफसोस नहीं है कि मैं कुछ खरीद नहीं सका। अफसोस इस बात का है कि मैं कुछ बेच क्यों नहीं रहा हूं।

Sunday, 6 May 2012

सैर के वास्ते थोड़ी सी फजा और सही



सामाजिक पंचायतों के बारे में मुझे अधिक जानकारी नहीं है। जातीय समाज से ज्यादा लेना देना कभी नहीं रहा।
एक दोस्त पिछले दो दिनों से अपने समाज की पंचायत के बारे में बता रहा है। कल उसने साथ चलने का प्रस्ताव दिया था। उसने बताया कि ज्यादातर लोग शराब के नशे में रहते हैं। अंतरजातीय विवाह करने वालों को जमकर जलील करते हैं। उन्हें वापस समाज में मिलाने के लिए भारी भरकम पैसे लेते हैं।
दोस्त के बड़े भाई ने दूसरे समाज की लडक़ी से शादी की है। अपने पिताजी के विरोध के बाद भी वह नहीं माना। उनके परिवार का सामाजिक बहिष्कार चल रहा है। ये लोग समाज की बैठक में गए थे। समाज में मिलाने का आवेदन दिया। रात भर बैठक चलती रही। दूसरे दिन दस बजे नंबर आया। तब तक भाई भाभी आराम करने घर चले गए थे। बैठक के संचालक नाराज होने लगे। फिर किसी रिश्तेदार ने कहा कि इससे पहले अंतररजातीय विवाह के पांच मामले आ चुके हैं। इन लोगों ने इनमें से किसी को समाज में नहीं मिलाया। तुम्हारे साथ भी यही होगा। दोस्त अपने भाई भाभी को लौटा लाया। घर में उसके पिताजी नाराज हुए। दोस्त का कहना है कि घर में लडक़ी की शादी तो है नहीं। अब देखा जाएगा।
मुझे सुनकर अच्छा लगा कि एक नवविवाहित युवक ने समाज में न मिलाने का फैसला सुनकर हाथ जोड़ लिए और कहा कि यहां अपनी पत्नी का चीरहरण करवाने नहीं आया हूं। दंड के पैसे मैं साथ लाया हूं, समाज में मिलाना होगा तो सूचित कर देना। समाज के दबंगों के आगे लोग पैसे देने का विरोध नहीं कर पाते लेकिन अपनी बात कह तो रहे हैं।
पैसे लेकर क्या होगा? समाज के पदाधिकारी गुलछर्रे उड़ाएंगे। या अपना रुतबा बनाए रखने में उन्हें मदद मिलेगी। लडक़ी समाज में मिल भी गयी तो वह सजायाफ्ता अपराधी का जीवन गुजारेगी। यह कैसा मिलाना हुआ?
अंतरजातीय विवाह अपराध कैसे हो गया? मेरे खयाल से देश का कानून तो ऐसा नहीं कहता। मैं नहीं जानता कि सामाजिक फैसले के खिलाफ अदालत में जाने से क्या होगा। अगर समाज का यह ढकोसला खत्म होता है तो लोगों को अदालत में भी जाना चाहिए। मेरा खयाल है कि समाज इन लोगों से मिलकर नहीं बनता। वह समाज के उदार और व्यावहारिक लोगों से बनता है। समाज के बहुत से लोग हैं जो जातीय दायरे से ऊपर उठकर काम करते हैं। उन्हें समाज की परिभाषा को, उसके सोचने और काम करने के ढंग को बदलना चाहिए।
जातीय समाजों को अपने खान पान, गीत संगीत, पहनावे ओढ़ावे, अपनी भाषा को बचाना चाहिए। उसका संवर्धन करना चाहिए। लेकिन ऐसी संकीर्ण सोच होगी तो संवर्धन कैसे होगा।
इसीलिए तो आजाद खयाल कवि और कलाकार समाज की संकीर्णता पर चोट करते हैं। समाज लोगों को डराने और उनसे पैसे वसूलने के लिए तो नहीं होना चाहिए। वह लोगों की मदद के लिए होना चाहिए।
मेरे दोस्त के घर में उसकी भाभी के जरिए कितनी नयी चीजें आएंगी। नए व्यंजन बनेंगे। हो सकता है भाई नयी भाषा सीख ले। भाभी के घर वाले भी नयी बातें सीखेंगे। समाज के लोग ये क्यों नहीं सोचते?
कोई तानाशाह नहीं चाहता कि लोग अपने विवेक से काम करें। ऐसे ही लोग समाज में जन्नतें और दोजखें बनाकर रखते हैं। मगर बहुत से लोग फिर भी प्यार की राह पर चलते हैं जो धर्म और जाति की सीमाएं नहीं जानता।
गालिब ने क्या खूब कहा है-
क्यूं न दोजख को भी जन्नत  में मिला लें या रब
सैर के वास्ते थोड़ी सी फजा और सही

ढूंढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती

कल दफ्तर में बैठे बैठे भूख लग आई। नीचे दाबेली के ठेले पर पहुंचा। दो दाबेलियां लीं और बीस रुपए दिए। उसने तत्काल दस रुपए लौटा दिए। कहा कि आपके दस रुपए लेकर क्या करूंगा। कल को आप कहीं पांच रुपए में दाबेली खाओगे और मुझे गाली दोगे। 
वह गरीब आदमी दिख रहा था। कुछ देर पहले एक ग्राहक को बता रहा था कि निगम वाले आते हैं तो ठेला हटाना पड़ता है। एक दिन में दो-तीन बार आ जाते हैं। ग्राहक अपनी राय दे रहा था कि नई जगह तलाश लो। उसने कहा कि जमने में ही छह महीने लग जाएंगे। यानी वह परेशान भी था। 
फिर भी उसका ईमान सलामत था। 
मुझे कभी कभी ऐसे लोग मिलते रहते हैं। कितनी अजीब बात है कि ऐसे लोग कभी कभी मिलते हैं। 
यानी मैं जिस समाज में रह रहा हूं उसमें बेईमानी बहुत आम हो गयी है। जिस धंधे में हूं वहां बेईमानी आम है। आसपास पैसा पैसा करते रहने वाले लोग बहुत हैं। पैसा कैसे आ रहा है, इसकी बहुत चिंता नहीं करते। इनमें से बहुत से लोग किसी का भला करना बेवकूफी मानते हैं। और दूसरों को भी ऐसा करने से रोकते हैं। 
वैसे मैं जानता हूं कि अच्छा सोचने वाले और अच्छा करने वाले लोग भी कम नहीं हैं। शायद मेरी ही पहुंच उन तक कम है।